"मैं नास्तिक क्यों हूँ?" — भगत सिंह के उस निबंध की कहानी, जिसने फांसी के तख्ते को भी नहीं डिगाया
फांसी की सजा सुनाई जा चुकी है। हाथों में भारी लोहे की बेड़ियां हैं। बाहर सिपाही पहरा दे रहे हैं। ज़िंदगी के बस कुछ महीने, शायद कुछ दिन बाकी हैं। ऐसे वक्त में एक आम इंसान क्या करेगा? ज़्यादातर लोग घुटनों के बल बैठकर ईश्वर से प्रार्थना करेंगे, स्वर्ग या मोक्ष की मांग करेंगे। लेकिन लाहौर सेंट्रल जेल की उसी ठंडी कोठरी में बैठा बाईस-तेईस साल का एक नौजवान कागज-कलम उठाता है और एक ऐसा निबंध लिखता है जो भारत के वैचारिक इतिहास को हमेशा के लिए बदल देता है — "मैं नास्तिक क्यों हूँ?" (Why I Am an Atheist)। उस नौजवान का नाम था भगत सिंह। हम उन्हें एक क्रांतिकारी के तौर पर जानते हैं — जिन्होंने असेंबली में बम फेंका, सांडर्स को मारा, हंसते-हंसते फांसी चूमी। लेकिन हम अक्सर उस भगत सिंह को भूल जाते हैं जो एक गहरा विचारक, एक दार्शनिक और एक अध्येता भी था। इस लेख में हम उनकी शहादत नहीं, बल्कि उनके दिमाग की बात करेंगे — उस निबंध का एक-एक तर्क खोलकर देखेंगे कि आखिर मौत के मुहाने पर खड़े होकर भी एक इंसान ने भगवान का सहारा लेने से इनकार क्यों किया। बाबा रणधीर सिंह का आरोप: "यह नास्तिकता नहीं, तु...